अतिसंवेदनशीलता

अतिसंवेदनशीलता क्या है? प्रकार, इलाज, रोकथाम | Hypersensitivity in Hindi

अतिसंवेदनशीलता क्या है? – Hypersensitivity in Hindi

अतिसंवेदनशीलता को अँग्रेजी में Hypersensitivity कहा जाता है। जब ऊतकों की क्षति का कारण प्रतिरक्षा प्रणाली की प्रतिक्रिया हो, तो उसे अतिसंवेदनशीलता की स्थिति कहा जा सकता है। इसके लक्षण में भिन्न एलर्जिक प्रतिक्रिया आती है।

हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली असामान्य तरीकें से प्रतिक्रिया करती है, तो इसका कुछ भी कारण हो सकता है। जिम्मेदार कारकों का पता लगाने के बाद ही हम अतिसंवेदनशीलता की रोकथाम या बचाव कर सकते है।

अतिसंवेदनशीलता के प्रतिजन पर्यावरण अंतर्जात या स्वयं अंतर्जात हो सकते है, जैसे- ड्रग एलर्जी, मौसमी एलर्जी, पशु एलर्जी, खाद्य एलर्जी, धूल एलर्जी, पराग एलर्जी, रोगाणु एलर्जी, रासायनिक एलर्जी आदि।

कई मानवीय अंगों की संवेदनशील अवस्था बढ़ जाती है, जब इम्यून सिस्टम में अवांछनीय विदेशी पदार्थ प्रवेश करता है। इसके लिए स्व-देखभाल तरीकों के साथ-साथ चिकित्सा सहायता और उचित दवाओं का निर्वहन आवश्यक हो जाता है।

कुछ अतिसंवेदनशीलता के लक्षण बचपन से या वंशानुगत हो सकते है, जिसकी रिसर्च पूरी होना अभी बाकी है।

एलर्जेन इम्यूनोथेरेपी या एलर्जी टीकाकरण के जरिये अतिसंवेदनशीलता का निवारण किया जा सकता है, इस बारें में अवधारणा है कि ये इलाज के तरीकें ज्यादातर पर्यावरण आधारित एलर्जी को ठीक करने में मददगार होते है।

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अतिसंवेदनशीलता के प्रकार – Types of Hypersensitivity in Hindi

अतिसंवेदनशीलता के मुख्य चार प्रकार है।

Type-1 Hypersensitivity

अतिसंवेदनशीलता का यह पहला प्रकार एंटीबॉडी मध्यस्थता पर आधारित होता है, जिसमें प्रतिरक्षी (Antibody) तय होता है, लेकिन प्रतिजन (Antigen) मुक्त होता है।

टाइप-1 अतिसंवेदनशीलता में बीटा कोशिकाओं को एक एंटीजन के लिए विशिष्ट एंटीबॉडी के उत्पादन हेतु प्रोत्साहित किया जाता है। इसमें IgE एंटीबॉडी होता है, टाइप 1 अतिसंवेदनशीलता की प्रतिक्रियाओं को दो चरणों में वर्गीकृत किया गया है, पहली तत्काल और दूसरी विलंब से।

तत्काल अतिसंवेदनशीलता प्रतिक्रिया एक्सपोजर के कुछ मिनट बाद होती है, इसमें वासोएक्टिव एमाइन और लिपिड मध्यस्थों (Vasoactive Amines और Lipid Mediators) की रिहाई शामिल होती है। जबकि विलंब चरण प्रतिक्रिया एक्सपोजर के 2-4 घंटे बाद होती है, इसमें साइटोकिन्स (Cytokines) की रिहाई शामिल होती है।

निम्न अवस्था Type-1 Hypersensitivity के उदाहरण है।

  • Food Allergy (खाने से एलर्जी)
  • Allergic Asthma (एलर्जी संबंधी अस्थमा)
  • Penicillin Allergy (पेनिसिलिन एलर्जी)
  • Allergic Rhinitis (एलर्जी रिनिथिस)
  • Sweet Itch (खुजली)

टाइप-1 अतिसंवेदनशीलता के इलाज हेतु कई प्रणालियां अपनाई जाती है।

एनाफिलेक्सिस (Anaphylaxis) एक तीव्र प्रणालीगत प्रतिक्रिया है, जो सेहत के लिए घातक साबित हो सकती है। इसमें उपचार के लिए एड्रेनालाईन (एपिनेफ्रिन) का चयन किया जाता है। यह उपचार रक्त के प्रवाह को बढ़ाने और उत्तेजित ब्रोन्कियल मांसपेशियों को आराम देकर एनाफिलेक्सिस का विरोध करता है।

टाइप-1 की अतिसंवेदनशीलता में कुछ एंटीहिस्टामाइन और कॉर्टिकोस्टेरॉइड को गंभीर प्रतिक्रियाओं के इलाज हेतु चुना जा सकता है।

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Type-2 Hypersensitivity

टाइप-2 अतिसंवेदनशीलता को एलर्जिक प्रतिक्रियाओं के गेल (Gell) और कॉम्ब्स (Coombs) समूह में वर्गीकृत किया गया है। दरअसल, यह एक एंटीबॉडी मध्यस्थता प्रक्रिया है, जिसमें IgG और IgM एंटीबॉडी सीधा कोशिकाओं के प्रतिरोधी (Antigen) पर असर करते है।

उदाहरण: Autoimmune Hemolytic Anemia नामक बीमारी में Red Blood Cells पर निशाना, Muscle Acetylcholine Receptor और प्लेटलेट्स पर प्रभाव आदि।

Type-3 Hypersensitivity

टाइप-3 अतिसंवेदनशीलता का सबसे मुख्य कारण Inflammatory Response (भड़काऊ प्रतिक्रिया) और Leukocytes (ल्यूकोसाइट्स) का आकर्षण है। यह तब होता है, जब इम्यून कॉम्प्लेक्स (एंटीजन-एंटीबॉडी) का संचय होने लगता है और जन्मजात प्रतिरक्षा कोशिकाएं उन्हें पर्याप्त रूप से साफ करने में असमर्थ होती है। इससे जटिल बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। इस प्रकार की अतिसंवेदनशीलता को कुष्ठ रोगों और ऑटोइम्यून जनित बीमारियों के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।

Type-4 Hypersensitivity

टाइप-4 अतिसंवेदनशीलता को विकसित होने में काफी समय लग सकता है। इसे विलंबित अतिसंवेदनशीलता भी कहा जाता है। अतिसंवेदनशीलता के अन्य प्रकारों की तुलना में यह भिन्न अतिसंवेदनशीलता है, इसमें एंटीबॉडी मध्यस्थता के बदले कोशिका मध्यस्थ प्रतिक्रिया होती है। इस प्रकार की प्रतिक्रिया में टी-कोशिकाओं, मोनोसाइट्स और मैक्रोफेज के बीच मेल शामिल है।

तपेदिक और फंगल संक्रमण से जुड़े कई पुराने संक्रामक रोग विलंबित अतिसंवेदनशीलता द्वारा देखने को मिल सकते है।

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अतिसंवेदनशीलता से इलाज व बचाव – Hypersensitivity Cure & Precautions in Hindi

अतिसंवेदनशीलता के सभी प्रकारों के अध्ययन उपरांत सुनिश्चित किया जाना चाहिए, कि किस प्रकार का अतिसंवेदनशीलता से जुड़ा रोग है।

इन मामलों में इलाज हेतु सर्वप्रथम एलर्जी से छुटकारा पाना आवश्यक होता है। ऐसी कुछ चीजें जिनके संपर्क में आने से हमारा स्वास्थ्य जल्दी उग्र उत्तेजित हो जाता हो और असामान्य गतिविधियां करता हो, तो ऐसी एलर्जी का इलाज अज्ञात एलर्जी की तुलना में कर पाना ज्यादा संभव हो पाता है। उ

दाहरण के लिए जैसे किसी को फोटोफोबिया है, जिसमें प्रकाश के प्रति आँखों की अतिसंवेदनशीलता बढ़ जाती है, तो इसका इलाज और रोकथाम स्वः तरीकों तथा चिकित्सीय परीक्षणों से हो सकता है।

किसी को फूड एलर्जी है, तो उन्हें तुरंत उस विशेष खाद्य के सेवन को बंद कर देना चाहिए, जिससे शारीरिक असंतुलन पैदा हो।

एलर्जी के मामलों का दवाओं से इलाज काफी हद तक मददगार साबित हुआ है। हालांकि एलर्जी या अतिसंवेदनशीलता को पूरी तरह ठीक कर पाना संभव नहीं है, लेकिन कुछ मानकों का मानना है कि डेसेंसिटिज़शन (Desensitization) प्रक्रिया द्वारा रोका या कम किया जा सकता है।

अतिसंवेदनशीलता के लिए चुने जाने वाली दवाइयां एलर्जी के प्रकार पर निर्भर करती है। इसमें कई दवाओं को शामिल किया है, जैसे- Anti-histamines (एंटीहिस्टामाइन), Steroids (स्टेरॉइड्स), Anti-inflammatory, Decongestant आदि। गंभीर मामलों के इलाज हेतु चिकित्सा सहायता के साथ-साथ घरेलू सावधानियां अत्यंत आवश्यक है।

यदि उपचार के उचित साधन नियोजित हो, तो अतिसंवेदनशीलता के लिए जिम्मेदार एलर्जी के लक्षणों से छुटकारा पाने में बस आधे से एक घंटे का समय लग सकता है।

एंटी-एलर्जी दवाओं की कीमत लगभग 30 रूपये एलर्जी के टीके के रूप में या जिसे डिसेन्सिटाइजेशन के रूप में भी ‎जाना जाता है। इसकी औसत लागत 1500 रूपये प्रति माह हो सकती है।

अतिसंवेदनशीलता ठीक करने वाली दवाओं की तुलना में डिसेन्सिटाइजेशन के परिणाम ज्यादा स्थायी और दीर्घकालिक है।

अतिसंवेदनशीलता के इलाज हेतु होम्योपैथी दवाओं का विकल्प अच्छा हो सकता है।

इलाज में संभावित दुष्प्रभाव

अतिसंवेदनशीलता के मूल इलाज में स्व-देखभाल के तरीकों से कोई दुष्प्रभाव नहीं होता है, लेकिन इस्तेमाल करने वाली विभिन्न वर्ग की दवाओं से दुष्प्रभावों का होना एक आम बात है।

अतिसंवेदनशीलता के प्रकार अनुसार निर्देशित की जाने वाली दवाओं से चक्कर आना, उनींदापन, बेचैनी, सिरदर्द, मतली, धुंधलापन, मुँह सुखना, उल्टी आदि आम दुष्प्रभाव हो सकते है।

गंभीर स्थितियों में इन दवाओं से गले में सूजन, छाती में जकड़न, दर्द, घरघराहट, छींके आदि दुष्प्रभाव संभव हो सकते है।

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