अश्विनी मुद्रा क्या है? विधि, फायदे, नुकसान, सावधानिया

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Ashwini Mudra in Hindi: इस लेख में हम अश्विनी मुद्रा के बारे में जानेंगे। अश्विनी मुद्रा एक योग की तरह है, जिसके बहुत से फायदे है, खासकर स्वप्नदोष (Nightfall), बवासीर (Piles), त्वचा (Skin), बालों (Hair) में।

इस लेख में आपको अश्विनी मुद्रा क्या है, इतिहास (History), फायदे (Benefits), विधि (Method), और सावधानिया (Precautions) बताएँगे।

अश्विनी मुद्रा क्या है?

मुद्रा एक संस्कृत शब्द है, जिसका मतलब हाव-भाव, भंगिमा होता है। इस अनुसार अश्विनी मुद्रा का तात्पर्य अश्व (घोड़े) के भंगिमा या हाव-भाव से है।

मतलब इस मुद्रा का इजात घोड़े के जीवनशैली से घोड़े जैसी चुस्ती, ताकत और ऊर्जा पाने के लिए हुआ है। घोड़ा शक्ति का सूचक है, इसलिए खपत होने वाली बैटरी के शक्ति की इकाई भी Horsepower रखी गयी है और यौन शक्ति बढ़ानेवाले विज्ञापनों में भी घोड़े जैसी शक्ति की बात की जाती है, न कोई दूसरे जानवरों की।

घोड़ा अपने पूरे जीवन में मात्रा 4-5 बार ही बैठता है, उसके बावजूद भी वह हमेशा चुस्त, बहुत भारी सामानों के साथ लंबी दूरी तय करता है।

अश्विनी मुद्रा का प्रमुख लक्ष्य इन्सानों में भी घोड़े जैसे गुण लाने का है।

अश्विनी मुद्रा का इतिहास

प्रारम्भ में अश्विनी मुद्रा सामान्य मुद्रा न होकर, एक हठयोग की क्रिया थी। जो कुंडलिनी जागरण, वीर्य को उर्ध्वगामी बनाने, आध्यात्मिक ऊर्जा, काम ऊर्जा को संतलित एवं संचय करने के लिए उपयोग किया जाता था।

लेकिन धीरे धीरे इसके आध्यात्मिक फायदों के अलावा बहुत सारे भौतिक जीवन से जुड़े फायदे भी सामने आये। इसकी सरलता, अनगिनत फायदों के कारण और योग के वैश्विक विस्तार के साथ अश्विनी मुद्रा का फैलाव हुआ। और आज योग की दुनिया में अश्विनी मुद्रा बहुत प्रचलित रूप ले चुका है।

पढ़िये:

अश्विनी मुद्रा कैसे करते है – विधि

घोड़ा मल-त्याग करने के बाद जिस तरह अपने गुदा-द्वार को 5-10 सिकोड़ता-छोड़ता है, वो ही उसकी ताकत का राज है और मल-द्वार को कुछ समय तक सिकुड़ना-छोड़ना अश्विनी मुद्रा कहलाता है।

यद्यपि अश्विनी मुद्रा करने की विधी, समय जानना ज़रूरी है। अश्विनी मुद्रा की विधी नीचे दी गई है,

  • चटाई या कम्बल का आसन बिछा कर रीढ़ की हड्डी सीधे कर किसी भी यौगिक आसन में बैठ जाए। अगर आसन पर बैठने में दिक्कत होती हो तो कुर्सी पर बैठ सकते है।
  • पूरे आसन के दौरान रीढ़ की हड्डी सीधे रखे। अगर आपकी रीढ़ की हड्डी सीधी नहीं रहती, तो अपने पीठ को दीवार के सहारे लगाकर भी बैठ सकते है।
  • सीधे बैठते हुए 6-10 बार गहरी साँस ले और छोड़े।
  • उसके बाद गुदा-द्वार और लिंग को एक साथ 1-2 सेकंड के लिए सिकुड़े ,फिर छोड़ दे। सांस सामान्य ही चलनी चाहिए। ऐसा करना एक अश्विनी मुद्रा लगाना हुआ।
  • आप शुरुआत में 20-30 मुद्रा लगा सकते है। जैसे-जैसे आपकी ताकत बढ़ेगी, आप संख्या बढ़ाकर 100 तक कर सकते है।

अगर ये करते हुए आपकी क्षमता काफी बढ़ गए हो, तो आप कुम्भक के साथ भी लगा सकते है। उसके लिए दाढ़ी को गले में सटाते हुए सांस बाहर छोड़कर गुदा द्वार को ऊपर खेचे। गुदा द्वार और लिंग को सिकुड़ते हुए, शक्ति अनुसार सांस बाहर रोके और सांस लेते हुए गुदा-लिंग द्वार को छोड़ दे। ऐसा 5-6 मिनट कर सकते है।

अश्विनी मुद्रा कौन कर सकता है?

  • अश्विनी मुद्रा बच्चे से बूढ़े तक कोई भी स्वस्थ पुरुष एवं महिलाये कर सकती है।
  • उच्च रक्तचाप वाले मरीजों को अश्विनी मुद्रा ज्यादा नही करनी चाहिए या धीमे गति से करना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं को किसी योगाचार्य या जानकार के निगरानी में अश्विनी मुद्रा करनी चाहिए।
  • अस्थमा के मरीजो को कुम्भक के साथ अश्विनी मुद्रा नही करनी चाहिए।

अश्विनी मुद्रा कब करनी चाहिए?

अश्विनी मुद्रा पूरे 24 घंटे में कभी भी खाली पेट किया जा सकता है। लेकिन, सुबह और शाम का समय ज्यादा बेहतर होता है।क्योंकि ये समय शीलत होता है और अश्विनी मुद्रा करने से शरीर में थोड़ी गर्मी भी बढ़ती है।

अतः सुबह-शाम मल त्याग करने के बाद आप अश्विनि मुद्रा कर सकते है।

वैसे तो अश्विनी मुद्रा को किसी भी मौसम में कर सकते है। लेकिन, गर्मी में अश्विनी मुद्रा को थोड़ा कम करना चाहिए। ठंडी में आप संख्या बढ़ा सकते है।

अश्विनी मुद्रा कितना करना चाहिए ?

अगर आप किसी भी उम्र के स्वस्थ आदमी हो या आपकी समस्या ज्यादा गंभीर नही है, तो दिन में 1 बार बताये गए तरीके से 30-40 बार करना उचित रहेगा है।

अगर आपको स्वप्नदोष, धातुरोग, बवासीर, कामवासना का वेग, प्रजनन इत्यादि की गंभीर समस्या हो तो दिन में 2 बार सुबह-शाम 100 बार तक कर सकते है।

अश्विनी मुद्रा के फायदे

अश्विनी मुद्रा के फायदों को हम दो भागो में बाँट सकते है,

  • चिकित्सकीय फायदे
  • आध्यात्मिक फायदे

1. चिकित्सकीय फायदे

  • स्त्री एवं पुरुष दोनों के प्रजनन, मूत्राशय से जुड़ी सभी गंभीर एवं सामान्य समस्याये जैसे स्वप्नदोष, वीर्य का पतला होना, शीघ्रपतन, लिंग का ढीलापन, पेशाब के साथ खून का निकलना, अत्यधिक काम वासना सताना, स्त्रियों का अनियमित मशिक धर्म, योनि का ढीलापन, नपुंसकता , बाँझपन इत्यादि को ठीक करता है।
  • अश्विनी मुद्रा पुराने से पुराना पाइल्स, बवासीर को भी ठीक करने में मदद करता है। लेकिन, अश्विनी मुद्रा के साथ आप अपनी दवाइयां जारी रखें।
  • अश्विनी मुद्रा कब्ज से निजात पाने में मदद करता है।
  • पेट की समस्या जैसे अपचन, खाने का आंतों में रहकर सड़ना, पाचन क्रिया का गड़बड़ रहना, खाने के तुरंत बाद मल के लिए दबाब बनना, पेशाब बार-बार होना इत्यादि को भी ठीक करने में मदद करता है।
  • प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाता है। जीवन की गुणवक्ता बढ़ाता है।
  • अश्विनी मुद्रा के नियमित अभ्यास से किसी भी उम्र के साधक में बहुत ऊर्जा, चुस्ती-फुर्ती और ताकत आती है।
  • अश्विनी मुद्रा नियमित करने से भावनाओं पर अच्छी पकड़ बनती है।
  • इससे चेहरे पर चमक बढ़ती है एवं और Aura भी बेहतर होता है।
  • प्रोस्ट्रेट की बीमारी को भी ठीक करता है।

2. आध्यात्मिक फायदे

  • अश्विनी मुद्रा कुंडलिनी जागरण, वीर्य ऊर्जा को उर्ध्वगामी बनाने एवं आध्यात्मिक ऊर्जा को संचय, काम ऊर्जा को संतलित और संचय करने में मदद करता है।
  • अश्विनी मुद्रा मेधा, समझ, आत्मबल बढ़ाने में भी मदद करता है।
  • अश्विनी मुद्रा से योगियों को ब्रह्मचर्य बनाये रखने में मदद मिलती है।

पढ़िये:

अश्विनी मुद्रा से जुड़ी सावधानिया

अश्विनी मुद्रा करते समय निम्नलिखित सावधानियों बरतनी चाहिए।

  • उच्च रक्तचाप वाले मरीजों को अश्विनी मुद्रा ज्यादा नही करना चाहिए और धीमे गति से ही करना चाहिए।
  • गर्भवती महिलाओं को किसी योगाचार्य या जानकार के निगरानी में अश्विनी मुद्रा करनी चाहिए।
  • अस्थमा के मरीजो को कुम्भक के साथ अश्विनी मुद्रा नही करनी चाहिए। उन्हें सामान्य अश्विनी मुद्रा 20-30 बार करना चाहिए।
  • अश्विनी मुद्रा करते समय आपको उचित मात्रा में पानी पीना चाहिए। एक इंसान की अपने वजन का 5% पानी दिनभर में पीना चाहिए।
  • अश्विनी मुद्रा खाली पेट ही करना चाहिए।

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